अगली बॉल टॉम ने धीरे से खेली और मुझे रन के लिए पुकारा, लेकिन मैंने हाथ ऊपर किया और अपनी क्रीज पर खड़ा रहा। टॉम पिच पर आधी दूरी तक आ चुका था, तभी बॉल उसके स्टंप्स से टकराई और वह रन आउट हो गया। पैवेलियन की ओर कदम बढ़ाते हुए उसने जिस तरह मुझे घूरकर देखा, उसका वैसा ही असर पड़ा जैसा उसके द्वारा निभाई गई खलनायक की भूमिकाओं में उसके हाव-भाव का होता है।
रस्किन बॉन्ड
पद्मश्री ब्रिटिश मूल के साहित्यकार
हांलैंडोर के वे बंदर भी बैंक में हैं। वे बैंक खुलने से पहले वहां होेते हैं। खूब ऊधम मचाते हैं और छत को तहस-नहस करने के लिए जो भी कर सकते हैं, करते हैं। जब बैंक बंद होता है तब भी वे वहां होते हैं और जिरेनियम के उन पौधों को तार-तार कर देते हैं जिन्हें मैनेजर ने इतने प्यार से उगाया है। बैंक के खुलते ही मैं भी वहां पहुंच जाता हूं। हमेशा की तरह इस सप्ताहांत भी मेरे पास पैसे कम पड़ गए। नतीजा यह है कि मेरी जेब में केवल एक पचास का कटा-फटा नोट है। बैंक ठीक दस बजे पाबंदी से खुल गया। बदकिस्मती से बैंक में भी पैसा नहीं है। नहीं, नहीं, यह उन अमेरिकी बैंकों की तरह धराशायी नहीं हुआ है। बात सिर्फ यह है कि जो टैक्सी मसूरी स्थित मुय ब्रांच से कैश लेकर आती है, वह सैलानियों की जबर्दस्त और अभूतपूर्व बाढ़ के कारण ट्रैफिक जाम में फंस गई है।
बहरहाल मैं मैनेजर के साथ चाय पीते हुए वक्त गुजारने लगता हूं। कैशियर के साथ नवीनतम क्रिकेट मैच के बारे में बात छिड़ जाती है। उनकी राय है कि मैच का नतीजा इस बात पर निर्भर करेगा कि टॉस कौन जीतता है, जबकि मेरी राय यह है कि वही टीम जीतेगी जिसके खिलाड़ी पिछली रात को अच्छी तरह सोए होंगे। पैसा सुरक्षित ढंग से अंततज् पहुंच जाता है और मैं फिर खिलखिलाती धूप में निकल आता हूं। तभी कई छोटे-छोटे लड़के मुझसे टकरा जाते हैं और क्रिकेट की गेंद के लिए कुछ रुपए देने की मांग करने लगते हैं। मैं एक नया पचास का नोट उनके हवाले कर देता हूं। आगे बढ़ता हूं तो मेरी मुलाकात अचानक टॉम आल्टर क्रिकेट टीम के कई सारे सदस्यों से होती है। वे जोर देकर कहते हैं कि धोबी घाट टीम के खिलाफ उनकी इनविटेशन इलेवन टीम का मैच होने वाला है और मैं उसमें जरूर खेलूं। मुझे बताया गया कि मैच चे टांबी लैट में होगा।
अपनी उम्र को भूलकर और दून हीरोज की टीम में बारहवें खिलाड़ी के रूप में खेलने के अपने महान दिनों को याद करते हुए मैंने सहमति दे दी, लेकिन मेरी एक शर्त थी कि मेरी जगह कोई और खिलाड़ी फीçल्डंग करेगा। (अब मैं बारहवां खिलाड़ी नहीं होऊंगा)। तो धोबी घाट टीम ने अच्छा-खासा स्कोर खड़ा कर लिया था। सातवें नंबर पर जब मैं बैटिंग करने के लिए आया तब टॉम की इनविटेशन इलेवन साठ या सत्तर रनों से पीछे थी। दूसरे छोर पर पारियों को थामे हुए टॉम बैटिंग कर रहे थे। जो शस बॉलिंग कर रहा था (वह शहर में ड्राई क्लीनिंग की दुकान चलाता था), वास्तव में कमाल की रतार से गेंद फेंकता था और उसकी पहली ही गेंद मेरे सीने के नीचे आकर लगी। वह तो अच्छा हुआ कि शरीर के इस हिस्से पर मेरी पैडिंग अच्छी है (कुदरत की मेहरबानी से) लेकिन फिर भी मैंने कसम खाई कि इस ड्राई क्लीनर की दुकान पर अब फिर कभी कपड़े नहीं दूंगा। दूसरी गेंद ने मेरे बल्ले का किनारा लिया और तेजी से चार रनों के लिए चली गई। क्ववेल प्लेड, रस्किन,ं टॉम ने मेरा हौसला बढ़ाते हुए कहा। मैंने तय किया कि अपने अगले स्क्रीनप्ले में उसके लिए भी एक भूमिका लिखूंगा। तीसरी गेंद को मैंने धीरे से कवर में खेल दिया और रन लेने के लिए दौड़ पड़ा। मैं यह बिल्कुल भूल गया कि पिछले पचास सालों से मैंने एक भी रन नहीं लिया है। इसके बावजूद दूसरे छोर पर पहंुच गया। मैं हांफ रहा था और मेरे पैर कांप रहे थे। अगली बॉल टॉम ने धीरे से खेली और मुझे रन के लिए पुकारा! जॉगर्स पार्क (लैंडोर के कब्रिस्तान का यही नाम है) में सो रही महान आत्माओं में शामिल होने का मेरा कोई इरादा नहीं था। लिहाजा मैंने हाथ ऊपर किया और क्रीज पर खड़ा रहा। टॉम पिच पर आधी दूरी तक आ चुका था, तभी बॉल उसके स्टंप्स से टकराई और वह रन आउट हो गया। पैवेलियन की ओर कदम बढ़ाते हुए उसने जिस तरह मुझे घूरकर देखा, उसका वैसा ही असर पड़ा जैसा उसके द्वारा निभाई गई खलनायक की भूमिकाओं में उसके हाव-भाव का होता है। मैंने किसी तरह एक झटके से चार और रन बनाए और फिर बोल्ड हो गया। जब मैं पैवेलियन (गार्डनर के शेड में) लौटा, तो टॉम ने मजे लेते हुए कहा, क्वतुहारे लिए लिखने का काम ही बेहतर है रस्किनं। वह भूल गया कि मैंने उससे ज्यादा रन बनाए थे! बाद में मुझे न सिर्फ सबके चाय-नाश्ते का भुगतान करना पड़ा, बल्कि इनाम की धनराशि (जो धोबी घाट टीम ने जीती) में भी अपना योगदान देना पड़ा। नतीजा यह हुआ कि मुझे एक बार फिर बैंक जाना पड़ा।
लंच के लिए मैं समय से घर में था। मेरा प्रिय खाना बना था राजमा-कढ़ी और साथ में आम का अचार व गरमा-गरम चपातियां। यह शनिवार का दिन था, बच्चे स्कूल से घर आ चुके थे, और हम सब साथ दुबके हुए थे। केवल गौतम के अलावा, जो भूख हड़ताल पर था क्योंकि जिस सेटरडे आइसक्रीम का उससे वादा किया गया था, वह उसे नहीं मिली थी। फिर उसके पिता आए और सबको ड्राइव पर धनौल्टी ले गए जहां आइसक्रीम इफरात से मिलती थीं।वे दिन गए जब पिकनिक के लिए ढेरों तैयारियां की जाती थीं, मेहनत से लंच बास्केट पैक की जाती थी, फिर गर्म और धूल भरी सड़क के बियाबान में पैदल निकल पड़ते थे। अब लोग पैदल नहीं चलते। वे कारों में सवार होते हैं और ड्राइव करते हुए भीड़भाड़ भरे क्वपिकनिक स्पॉटं पर पहुंच जाते हैं जहां किस्म-किस्म के ढाबों में उन्हें चाऊमीन और पिज्जा जैसे राष्ट्रीय व्यंजन बने-बनाए मिल जाते हैं। उधर ब्रिटेन में भारतीय व्यंजन लोगों के सिर चढ़कर बोल रहे हैं, यहां भारतीय तश्तरियों को चीनी और इतालवी व्यंजनों ने फतह कर लिया है। यही है आपका ग्लोबलाइजेशन।लेकिन मैं उन पुराने वक्त की पिकनिकों की कमी बहुत महसूस करता हूं। उनमें बहुत आरामतलबी होती थी और घर के बाहर काफी मौज-मस्ती की जाती थी। तब लगता था कि हमारे पास वक्त ही वक्त है और पिकनिक का मतलब होता था पूरा दिन घर के बाहर बिताना। शिमला में हम ब्रोकहस्र्ट टेनिस कोर्ट (अब यहां अपार्टमेंट बिçल्डंग बन गई हैं) पर पिकनिक मनाया करते थे, या जतोग या समर हिल पर निकल जाया करते थे, या छोटा शिमला से आगे चले जाते थे। लेकिन जाखू नहीं जाते थे जहां बंदर आपके साथ पिकनिक मनाने को अधीर बैठे रहते थे।
देहरादून में हम सल्फर çस्प्रंग्ज पर पिकनिक मनाने जाते थे, या राजपुर के नजदीक की पहाçड़यों पर चले जाते थे, या फिर टौंस या सुरवा नदियों के किनारे पर निकल जाते थे। सॉन्ग जहां गंगा से मिलती है, उसके ठीक पहले आप रायवाला में मछली पकड़ने भी जा सकते थे। छड़ी और कांटे से लैस होकर मैं और मेरे कुछ दोस्त वहां मछली पकड़ने गए थे, लेकिन अनाड़ी होने की वजह से हमारे हाथ कुछ नहीं लगा। नदी के किनारे पड़ाव डाले कुछ फौजियों ने दर्जनों मछलियां पकड़ीं (मुझे शक है उन्होंने विस्फोटकों से हतप्रभ करके उन्हें फंसाया) और उनमें से दो-एक बड़ी सिंघारा मछलियां उन्होंने हमें दे दीं। हम अपनी इस क्वपकड़ं के साथ देहरादून लौटे और अपने दोस्तों व पड़ोसियों पर मछली पकड़ने में अपनी निपुणता और दिलेरी की खूब छाप छोड़ी।
मंगलवार, 8 सितंबर 2009
शुक्रवार, 4 सितंबर 2009
बद्रीनाथ को जाती सड़क
अपने छोटे से कमरे की खिड़की खोलकर जैसे ही मैंने बाहर नजर डाली, बर्फ से ढंकी हुई नीलकंठ की चोटी पर सूरज चढ़ता हुआ दिखाई दिया। पहले-पहल तो बर्फ गुलाबी रंग की हुई, फिर नारंगी और फिर सुनहरे रंग में बदल गई। जब मैंने आकाश में तने हुए उस भव्य शिखर को देखा तो मेरी सारी नींद हा हो गई। और उसी क्षण उस चोटी पर भगान विष्णु अवतरित हुए।
रस्किन बॉन्ड
पद्मश्री ब्रिटिश मूल के साहित्यकार
अगर आपने मंदाकिनी घाटी की यात्रा की है और अलकनंदा की घाटी तक भी गए हैं तो आपको दोनों में काफी फर्क महसूस हुआ होगा। मंदाकिनी घाटी ज्यादा नाजुक, समृद्ध और हरी-भरी है। कई ज
गह तो ऐसा लगता है मानो सचमुच चरागाह उग आए हैं, जबकि अलकनंदा घाटी ज्यादा आकर्षक, ढलान जैसी, खतरनाक और अकसर उन लोगों के प्रति कठोर होती है, जो उसके आसपास की जगहों में रहते हैं और अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए काम करते हैं। जैसे ही हम चमोली से आगे बढ़ते हैं और बद्रीनाथ की सीधी, घुमादार चढ़ाई शुरू होती है, प्रकृति का चेहरा बहुत नाटकीय ढंग से बदलने लगता है। नदी की ओर जाते हुए हरे-भरे ढलुआ मैदान गायब होने लगते हैं। यहां पहाड़ ज्यादा जोखिम भरे ढलुआ चट्टानों में बदलने लगते हैं, पहाड़ तीखे और संकरे होते जाते हैं और नीचे बह रही नदी संकरे पहाड़ी रास्तों के संग कल-कल करती हुई भगीरथ, देप्रयाग पहुंचने के लिए बेताब हो रही होती है।
बद्रीनाथ मंदिर प्रबंधन का रिसॉर्ट जोशीमठ बलखाती हुई अलकनंदा के साथ-साथ ऊंचाई पर बना हुआ चिड़ियों के बैठने का अड्डा है। ६००० फीट की ऊंचाई पर मौसम बहुत सुहाना हो जाता है। यह खासा बड़ा कस्बा है। हालांकि आसपास की पहाड़ियां बिलकुल निर्जन नजर आती हैं, लेकिन यहां एक महान वृक्ष है, जो वक्त के थपेड़ों के बाद भी ज्यों का त्यों खड़ा है। यह प्राचीन शहतूत का पेड़ है। इसे कल्पवृक्ष (कामना पूर्ण करने वाला) कहते हैं। इसी वृक्ष के नीचे सदियों पूर्व शंकराचार्य ने ध्यान किया था। कहते हैं कि यह वृक्ष २००० वर्ष पुराना है और यह निश्चित ही मसूरी में मेरे चार कमरों के खासे बड़े फ्लैट से भी ज्यादा बड़ा है। मैंने कुछ बहुत विशालकाय वृक्ष देखे हैं, लेकिन यह संभतया उनमें सबसे प्राचीन और सबसे विशाल है। मुझे खुशी है कि शंकराचार्य ने इस वृक्ष के नीचे तपस्या की और इसे हमेशा के लिए सुरक्षित कर दिया। वरना यह पेड़ भी उन्हीं तमाम पेड़ों और जंगल की राह पर चला जाता, जो कभी इस इलाके में बहुत फले-फूले थे।
एक छोटा लड़का मुझसे कहता है कि यह कल्प वृक्ष है, इसलिए मैं इससे कुछ मांग सकता हूं। मैं मांगता हूं कि उसी की तरह हां के और पेड़ भी हरे-भरे रहें। ‘तुमने क्या मांगाज्, मैंने उस लड़के से पूछा। ‘मैंने मांगा कि आप मुझे पांच रुपए दोगे, उसने बड़ी चतुराई से जवाब दिया। उसकी इच्छा पूरी हो गई। मेरी इच्छा भविष्य की अनिश्चितताओं में छिपी हुई है, लेकिन उस लड़के ने मुझे कामना करने का पाठ सिखाया।
बद्रीनाथ में रहनेवाले लोग नंबर में यहां आ जाते हैं, जब मंदिर छह महीने के लिए पूरी तरह बर्फ से ढंक जाता है। यह बहुत खुशनुमा फैला हुआ पहाड़ी रिसॉर्ट है, लेकिन यहां पर छोटे होटल, आधुनिक दुकानें और सिनेमा हॉल भी हैं। जोशीमठ का विकास और हां आधुनिकता के पांव पड़ने की शुरुआत १९६० के बाद से हुई, जब पैदल तीर्थयात्रा के मार्ग पर पक्की सड़क बनने की शुरुआत हुई, जो तीर्थयात्रियों को बद्रीनाथ तक लेकर जाती है। अब तीर्थयात्री उस कल्प वृक्ष की छांव से वंचित रह जाते हैं क्योंकि वह मुख्य सड़क के रास्ते से थोड़ा हटकर है। अब लोग बस, निजी गाड़ियों या लक्जरी कोच से उतरते हैं, रास्ते में पड़नेवाले किसी रेस्त्रां में तरोताजा होते हैं और आगे बढ़ जाते हैं।
लेकिन अब भी कुछ लोग हैं जो बहुत कठिन रास्ता पार करके यहां तक आते हैं। खासकर वे लोग जिन्होंने संन्यास ले लिया है। ये धूप और बारिश, झाड़ियों से उड़नेवाली धूल और रास्ते के नुकीले कंकड़-पत्थरों की परवाह किए बगैर बद्रीनाथ से ऋषिकेश तक की यात्रा करते हैं। यहां पर एक ऐसा युवक मिला जो रोलर स्केट पहनकर पूरी यात्रा कर रहा था। उसके ऐसा करने की वजह न तो धार्मिक थी और न आध्यात्मिक। उसने बताया कि उसकी इच्छा है कि उसका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्डस में शामिल हो। उसने मुझे अपनी इस उपलब्धि का गवाह होने के लिए कहा। वह चाहता था कि मैं बद्रीनाथ से लेकर ऋषिकेश तक रोलर स्केट्स पहनकर की जा रही उसकी पूरी यात्रा में शामिल होऊं। ‘बहुत खुशी से,जब मैंने उससे कहा। लेकिन तुम तो नीचे की ओर जा रहे हो और मैं ऊपर जा रहा हूं। मैंने उसे शुभकामनाएं दीं और कहा कि मैं गिनीज बुक में उसका नाम आने का इंतजार करूंगा। आखिरकार हम उस बंजर घाटी में पहुंच ही गए, तेज हाओं ने जिसे अपनी चपेट में ले रखा था। बद्रीनाथ की यह घाटी तेजी से विकसित होता कस्बा है। यह बहुत जिंदादिल और फलती-फूलती जगह है। ऊंची-ऊंची बर्फ से ढंकी चोटियों ने इसे चारों ओर से घेर रखा है। यहां होटलों और धर्मशालाओं की कमी नहीं है। इसके बाजूद हर होटल और रेस्ट हाउस हमेशा खचाखच भरे रहते हैं। तीर्थयात्रा के पूरे इलाके में यह सबसे ऊंची जगह है।
जिस तरह केदारनाथ हिमालय की घाटी में स्थित भगवान शिव के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक है, उसी तरह बद्रीनाथ वैष्ण संप्रदाय के लोगों के लिए पूजा का सबसे पवित्र स्थान है। इसी जगह भगवान विष्णु अपने भक्तों के समक्ष स्यंभू प्रकट हुए थे। उनकी चार भुजाएं थीं और मोतियों का मुकुट माला पहनी हुई थी। श्रद्धालुओं का कहना है कि आज भी महान कुंभ के दिन नीलकंठ की चोटी पर भगवन विष्णु के दर्शन किए जा सकते हैं। नीलकंठ चोटी इस समूचे क्षेत्र में सबसे विशाल और ऊंची है और हां पर मुश्किल से ही कोई पेड़ या वनस्पति जीति रह पाते हैं। नीलकंठ की चोटी जादुई और प्रेरणा देनेवाली है।
यह २१,६४० फीट ऊंची है और उसकी चोटी से बद्रीनाथ सिर्फ पांच मील दूर है। जिस शाम हम वहां पहुंचे थे, हम चोटी को नहीं देख सके क्योंकि बादलों ने उसे पूरी तरह ढंक लिया था। बद्रीनाथ खुद बादलों की धुंध के बीच छिपा हुआ था, लेकिन हमने किसी तरह अपना रास्ता बनाया और मंदिर तक पहुंचे। यह लगभग ५० फीट ऊंची रंग-बिरंगी और खूबसूरती से सजाई गई इमारत है। ऊपर चमकदार छत है। मंदिर में काले पत्थर पर उकेरी गई भगान विष्णु की एक प्रतिमा है, जिसमें ध्यान की मुद्रा में खड़े हुए हैं। लोगों का अंतहीन काफिला उस मंदिर से गुजरता है, जो भगवान विष्णु के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं और उनसे अपनी समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं।उस रंग-बिरंगे छोटे से मंदिर में चहल-पहल भरी खुशनुमा भीड़ का हिस्सा होना और एक पवित्र नदी को उसके उद्गम के इतने निकट से देखना बहुत सुखद था। और अगले ही दिन सुबह-सुबह मुझे इस सुखद अनुभव से गुजरने का मौका मिला। अपने छोटे से कमरे की खिड़की खोलकर जैसे ही मैंने बाहर नजर डाली, बर्फ से ढंकी हुई नीलकंठ की चोटी पर सूरज चढ़ता हुआ दिखाई दिया। पहले-पहल तो बर्फ गुलाबी रंग की हुई, फिर नारंगी और फिर सुनहरे रंग में बदल गई। जब मैंने आकाश में तने हुए उस भव्य शिखर को देखा तो मेरी सारी नींद हवा हो गई। और उसी क्षण उस चोटी पर भगवान विष्णु अतरित हुए। मुझे तनिक भी आश्चर्य नहीं था।
(दैनिक भास्कर से साभार)
रस्किन बॉन्ड
पद्मश्री ब्रिटिश मूल के साहित्यकार
अगर आपने मंदाकिनी घाटी की यात्रा की है और अलकनंदा की घाटी तक भी गए हैं तो आपको दोनों में काफी फर्क महसूस हुआ होगा। मंदाकिनी घाटी ज्यादा नाजुक, समृद्ध और हरी-भरी है। कई ज
गह तो ऐसा लगता है मानो सचमुच चरागाह उग आए हैं, जबकि अलकनंदा घाटी ज्यादा आकर्षक, ढलान जैसी, खतरनाक और अकसर उन लोगों के प्रति कठोर होती है, जो उसके आसपास की जगहों में रहते हैं और अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए काम करते हैं। जैसे ही हम चमोली से आगे बढ़ते हैं और बद्रीनाथ की सीधी, घुमादार चढ़ाई शुरू होती है, प्रकृति का चेहरा बहुत नाटकीय ढंग से बदलने लगता है। नदी की ओर जाते हुए हरे-भरे ढलुआ मैदान गायब होने लगते हैं। यहां पहाड़ ज्यादा जोखिम भरे ढलुआ चट्टानों में बदलने लगते हैं, पहाड़ तीखे और संकरे होते जाते हैं और नीचे बह रही नदी संकरे पहाड़ी रास्तों के संग कल-कल करती हुई भगीरथ, देप्रयाग पहुंचने के लिए बेताब हो रही होती है।बद्रीनाथ मंदिर प्रबंधन का रिसॉर्ट जोशीमठ बलखाती हुई अलकनंदा के साथ-साथ ऊंचाई पर बना हुआ चिड़ियों के बैठने का अड्डा है। ६००० फीट की ऊंचाई पर मौसम बहुत सुहाना हो जाता है। यह खासा बड़ा कस्बा है। हालांकि आसपास की पहाड़ियां बिलकुल निर्जन नजर आती हैं, लेकिन यहां एक महान वृक्ष है, जो वक्त के थपेड़ों के बाद भी ज्यों का त्यों खड़ा है। यह प्राचीन शहतूत का पेड़ है। इसे कल्पवृक्ष (कामना पूर्ण करने वाला) कहते हैं। इसी वृक्ष के नीचे सदियों पूर्व शंकराचार्य ने ध्यान किया था। कहते हैं कि यह वृक्ष २००० वर्ष पुराना है और यह निश्चित ही मसूरी में मेरे चार कमरों के खासे बड़े फ्लैट से भी ज्यादा बड़ा है। मैंने कुछ बहुत विशालकाय वृक्ष देखे हैं, लेकिन यह संभतया उनमें सबसे प्राचीन और सबसे विशाल है। मुझे खुशी है कि शंकराचार्य ने इस वृक्ष के नीचे तपस्या की और इसे हमेशा के लिए सुरक्षित कर दिया। वरना यह पेड़ भी उन्हीं तमाम पेड़ों और जंगल की राह पर चला जाता, जो कभी इस इलाके में बहुत फले-फूले थे।
एक छोटा लड़का मुझसे कहता है कि यह कल्प वृक्ष है, इसलिए मैं इससे कुछ मांग सकता हूं। मैं मांगता हूं कि उसी की तरह हां के और पेड़ भी हरे-भरे रहें। ‘तुमने क्या मांगाज्, मैंने उस लड़के से पूछा। ‘मैंने मांगा कि आप मुझे पांच रुपए दोगे, उसने बड़ी चतुराई से जवाब दिया। उसकी इच्छा पूरी हो गई। मेरी इच्छा भविष्य की अनिश्चितताओं में छिपी हुई है, लेकिन उस लड़के ने मुझे कामना करने का पाठ सिखाया।
बद्रीनाथ में रहनेवाले लोग नंबर में यहां आ जाते हैं, जब मंदिर छह महीने के लिए पूरी तरह बर्फ से ढंक जाता है। यह बहुत खुशनुमा फैला हुआ पहाड़ी रिसॉर्ट है, लेकिन यहां पर छोटे होटल, आधुनिक दुकानें और सिनेमा हॉल भी हैं। जोशीमठ का विकास और हां आधुनिकता के पांव पड़ने की शुरुआत १९६० के बाद से हुई, जब पैदल तीर्थयात्रा के मार्ग पर पक्की सड़क बनने की शुरुआत हुई, जो तीर्थयात्रियों को बद्रीनाथ तक लेकर जाती है। अब तीर्थयात्री उस कल्प वृक्ष की छांव से वंचित रह जाते हैं क्योंकि वह मुख्य सड़क के रास्ते से थोड़ा हटकर है। अब लोग बस, निजी गाड़ियों या लक्जरी कोच से उतरते हैं, रास्ते में पड़नेवाले किसी रेस्त्रां में तरोताजा होते हैं और आगे बढ़ जाते हैं।
लेकिन अब भी कुछ लोग हैं जो बहुत कठिन रास्ता पार करके यहां तक आते हैं। खासकर वे लोग जिन्होंने संन्यास ले लिया है। ये धूप और बारिश, झाड़ियों से उड़नेवाली धूल और रास्ते के नुकीले कंकड़-पत्थरों की परवाह किए बगैर बद्रीनाथ से ऋषिकेश तक की यात्रा करते हैं। यहां पर एक ऐसा युवक मिला जो रोलर स्केट पहनकर पूरी यात्रा कर रहा था। उसके ऐसा करने की वजह न तो धार्मिक थी और न आध्यात्मिक। उसने बताया कि उसकी इच्छा है कि उसका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्डस में शामिल हो। उसने मुझे अपनी इस उपलब्धि का गवाह होने के लिए कहा। वह चाहता था कि मैं बद्रीनाथ से लेकर ऋषिकेश तक रोलर स्केट्स पहनकर की जा रही उसकी पूरी यात्रा में शामिल होऊं। ‘बहुत खुशी से,जब मैंने उससे कहा। लेकिन तुम तो नीचे की ओर जा रहे हो और मैं ऊपर जा रहा हूं। मैंने उसे शुभकामनाएं दीं और कहा कि मैं गिनीज बुक में उसका नाम आने का इंतजार करूंगा। आखिरकार हम उस बंजर घाटी में पहुंच ही गए, तेज हाओं ने जिसे अपनी चपेट में ले रखा था। बद्रीनाथ की यह घाटी तेजी से विकसित होता कस्बा है। यह बहुत जिंदादिल और फलती-फूलती जगह है। ऊंची-ऊंची बर्फ से ढंकी चोटियों ने इसे चारों ओर से घेर रखा है। यहां होटलों और धर्मशालाओं की कमी नहीं है। इसके बाजूद हर होटल और रेस्ट हाउस हमेशा खचाखच भरे रहते हैं। तीर्थयात्रा के पूरे इलाके में यह सबसे ऊंची जगह है।
जिस तरह केदारनाथ हिमालय की घाटी में स्थित भगवान शिव के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक है, उसी तरह बद्रीनाथ वैष्ण संप्रदाय के लोगों के लिए पूजा का सबसे पवित्र स्थान है। इसी जगह भगवान विष्णु अपने भक्तों के समक्ष स्यंभू प्रकट हुए थे। उनकी चार भुजाएं थीं और मोतियों का मुकुट माला पहनी हुई थी। श्रद्धालुओं का कहना है कि आज भी महान कुंभ के दिन नीलकंठ की चोटी पर भगवन विष्णु के दर्शन किए जा सकते हैं। नीलकंठ चोटी इस समूचे क्षेत्र में सबसे विशाल और ऊंची है और हां पर मुश्किल से ही कोई पेड़ या वनस्पति जीति रह पाते हैं। नीलकंठ की चोटी जादुई और प्रेरणा देनेवाली है।
यह २१,६४० फीट ऊंची है और उसकी चोटी से बद्रीनाथ सिर्फ पांच मील दूर है। जिस शाम हम वहां पहुंचे थे, हम चोटी को नहीं देख सके क्योंकि बादलों ने उसे पूरी तरह ढंक लिया था। बद्रीनाथ खुद बादलों की धुंध के बीच छिपा हुआ था, लेकिन हमने किसी तरह अपना रास्ता बनाया और मंदिर तक पहुंचे। यह लगभग ५० फीट ऊंची रंग-बिरंगी और खूबसूरती से सजाई गई इमारत है। ऊपर चमकदार छत है। मंदिर में काले पत्थर पर उकेरी गई भगान विष्णु की एक प्रतिमा है, जिसमें ध्यान की मुद्रा में खड़े हुए हैं। लोगों का अंतहीन काफिला उस मंदिर से गुजरता है, जो भगवान विष्णु के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं और उनसे अपनी समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं।उस रंग-बिरंगे छोटे से मंदिर में चहल-पहल भरी खुशनुमा भीड़ का हिस्सा होना और एक पवित्र नदी को उसके उद्गम के इतने निकट से देखना बहुत सुखद था। और अगले ही दिन सुबह-सुबह मुझे इस सुखद अनुभव से गुजरने का मौका मिला। अपने छोटे से कमरे की खिड़की खोलकर जैसे ही मैंने बाहर नजर डाली, बर्फ से ढंकी हुई नीलकंठ की चोटी पर सूरज चढ़ता हुआ दिखाई दिया। पहले-पहल तो बर्फ गुलाबी रंग की हुई, फिर नारंगी और फिर सुनहरे रंग में बदल गई। जब मैंने आकाश में तने हुए उस भव्य शिखर को देखा तो मेरी सारी नींद हवा हो गई। और उसी क्षण उस चोटी पर भगवान विष्णु अतरित हुए। मुझे तनिक भी आश्चर्य नहीं था।
(दैनिक भास्कर से साभार)
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